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Vivekanand Tiwari News: निलंबन और इस्तीफे पर पहली बार बोले ट्रैफिक पुलिसकर्मी, मेडिकल लीव नहीं मिलने का लगाया आरोप

मध्य प्रदेश के शहडोल में निलंबित प्रधान आरक्षक विवेकानंद तिवारी ने कहा कि मानसिक तनाव और बीमारी के बावजूद उन्हें मेडिकल अवकाश नहीं मिला। उन्होंने अपनी छवि खराब करने की कोशिश का भी आरोप लगाया।

Vivekanand Tiwari News: मध्य प्रदेश के शहडोल में निलंबित प्रधान आरक्षक और सोशल मीडिया पर ट्रैफिक जागरूकता अभियानों के लिए चर्चित विवेकानंद तिवारी ने पहली बार अपने निलंबन, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और इस्तीफे को लेकर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय से मानसिक तनाव, अनिद्रा और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझने के बावजूद विभाग की ओर से उन्हें मेडिकल अवकाश नहीं दिया गया। उनका कहना है कि परिस्थितियां ऐसी बन गई थीं कि उन्हें नौकरी छोड़ने का फैसला लेना पड़ा, हालांकि उनका इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं किया गया है।

विवेकानंद तिवारी के अनुसार मई 2026 के दौरान उनकी तबीयत लगातार खराब रहने लगी थी। उन्हें रात में नींद नहीं आती थी, बार-बार चक्कर आने की शिकायत रहती थी और मानसिक तनाव के कारण एंग्जायटी की समस्या भी बढ़ गई थी। उन्होंने बताया कि चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टर ने उन्हें सात दिन आराम करने और इलाज कराने की सलाह दी थी। इसके बाद उन्होंने मेडिकल पर्ची और डॉक्टर की सलाह संबंधित अधिकारियों को भेजते हुए अवकाश का आवेदन भी प्रस्तुत किया, लेकिन उनकी छुट्टी स्वीकृत नहीं की गई।

तिवारी का कहना है कि मेडिकल अवकाश मंजूर न होने के कारण उन्हें ड्यूटी से अनुपस्थित माना गया। इसके बाद विभाग की ओर से उन्हें गैरहाजिर रहने का नोटिस जारी किया गया और बाद में निलंबन की कार्रवाई कर दी गई। उनका आरोप है कि यदि समय पर मेडिकल अवकाश मिल जाता तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। उन्होंने कहा कि उन्होंने विभागीय नियमों का पालन करते हुए अपनी बीमारी की पूरी जानकारी अधिकारियों को दी थी।

प्रधान आरक्षक ने यह भी आरोप लगाया कि निलंबन के बाद उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। उनके अनुसार उनकी और उनकी पत्नी की आय की जांच भी शुरू कर दी गई, जिससे मानसिक दबाव और बढ़ गया। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ते तनाव और व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण उन्हें पुलिस सेवा से इस्तीफा देने का निर्णय लेना पड़ा। हालांकि विभाग की ओर से अभी तक उनके इस्तीफे पर अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

विवेकानंद तिवारी ने बताया कि उनका परिवार लंबे समय से पुलिस सेवा से जुड़ा रहा है और उन्होंने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश पुलिस जॉइन की थी। शुरुआती दिनों से ही उन्होंने ट्रैफिक पुलिस में अपनी सेवाएं दीं और सड़क सुरक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया। कोरोना महामारी के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हुए ट्रैफिक नियमों के प्रति लोगों को जागरूक करने का अभियान शुरू किया।

सोशल मीडिया पर उनके वीडियो और जागरूकता संदेशों को लोगों ने काफी पसंद किया। धीरे-धीरे फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर उनके लाखों नहीं बल्कि करोड़ों फॉलोअर्स हो गए। उन्होंने सरल भाषा और व्यावहारिक उदाहरणों के जरिए हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने, यातायात संकेतों का पालन करने और सुरक्षित ड्राइविंग के महत्व को लोगों तक पहुंचाया। इसी वजह से उन्हें देशभर में एक अलग पहचान मिली।

तिवारी ने कहा कि सोशल मीडिया पर मिली लोकप्रियता का उद्देश्य कभी व्यक्तिगत प्रसिद्धि हासिल करना नहीं था, बल्कि लोगों को सड़क दुर्घटनाओं से बचाने और ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करना था। उनका मानना है कि यदि लोग यातायात नियमों का सही तरीके से पालन करें तो बड़ी संख्या में सड़क हादसों को रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि यही सोच उन्हें लगातार जागरूकता अभियान चलाने के लिए प्रेरित करती रही।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चाहे वह पुलिस की वर्दी में रहें या नहीं, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि भविष्य में भी वह सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से लोगों को ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूक करते रहेंगे। उन्होंने लोगों से सुरक्षित वाहन चलाने और कानून का पालन करने की अपील भी की।

फिलहाल इस पूरे मामले को लेकर विभाग की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं विवेकानंद तिवारी के बयान के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि विभाग उनके इस्तीफे और लगाए गए आरोपों पर आगे क्या निर्णय लेता है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।

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