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सरकारी दफ्तरों में अब परोसी जाएगी ‘यूल टी’, केंद्र सरकार का बड़ा फैसला

सरकारी बैठकों, कैंटीनों और कार्यक्रमों में स्वदेशी 'यूल टी' को बढ़ावा देने की पहल, एंड्रयू यूल कंपनी को मिलेगा बड़ा संस्थागत बाजार

Yule Tea: सरकारी दफ्तरों में ‘आत्मनिर्भर’ चाय को बढ़ावा, केंद्र सरकार ने लिया बड़ा फैसला

नई दिल्ली। Yule Tea को देशभर के सरकारी कार्यालयों में बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। भारी उद्योग मंत्रालय ने सभी केंद्रीय मंत्रालयों, विभागों और उनके अधीन आने वाले संस्थानों से अपील की है कि वे अपनी बैठकों, सरकारी कार्यक्रमों, सम्मेलन हॉल और कैंटीनों में एंड्रयू यूल एंड कंपनी लिमिटेड के ‘यूल टी’ ब्रांड की चाय के उपयोग को प्राथमिकता दें। सरकार का मानना है कि इस पहल से सार्वजनिक क्षेत्र की इस कंपनी को आर्थिक मजबूती मिलेगी और स्वदेशी उत्पादों को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

सरकारी बैठकों और कैंटीनों में मिलेगी प्राथमिकता

भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों से अनुरोध किया गया है कि वे अपने कार्यालयों में आयोजित बैठकों, सेमिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और कैंटीनों में Yule Tea के उपयोग को बढ़ावा दें।

यदि यह पहल बड़े स्तर पर लागू होती है तो सरकारी संस्थानों में यूल टी की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित होगी, जिससे कंपनी को स्थायी संस्थागत ग्राहक मिल सकेंगे।

सरकारी कंपनी को मिलेगा बड़ा बाजार

सरकार का उद्देश्य केवल एक ब्रांड को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एंड्रयू यूल एंड कंपनी लिमिटेड को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना भी है।

सरकारी कार्यालयों में नियमित मांग बढ़ने से कंपनी के उत्पादों की बिक्री में वृद्धि होगी और उसे बड़ा संस्थागत बाजार प्राप्त होगा। इससे कंपनी के राजस्व और परिचालन क्षमता में भी सुधार आने की उम्मीद जताई जा रही है।

क्या है एंड्रयू यूल एंड कंपनी?

एंड्रयू यूल एंड कंपनी लिमिटेड केंद्र सरकार के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम (PSU) है। कंपनी असम और पश्चिम बंगाल के 15 चाय बागानों का संचालन करती है और वर्षों से देश-विदेश में विभिन्न प्रकार की चाय का उत्पादन करती रही है।

कंपनी द्वारा तैयार की जाने वाली प्रमुख चायों में—

  • ऑर्थोडॉक्स टी
  • CTC टी
  • ग्रीन टी
  • फ्लेवर्ड टी

शामिल हैं।

इसके अलावा कंपनी लंबे समय से टी बोर्ड ऑफ इंडिया के माध्यम से संसद भवन सहित कई सरकारी संस्थानों में चाय की आपूर्ति भी करती रही है।

स्थायी समिति की सिफारिश के बाद लिया गया फैसला

जानकारी के अनुसार यह निर्णय संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति की सिफारिश के बाद लिया गया है।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि सरकारी विभागों को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के उत्पादों का अधिक उपयोग करना चाहिए, ताकि उन्हें स्थायी बाजार मिल सके और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो।

इसी सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार ने अब मंत्रालयों और विभागों को Yule Tea के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया है।

आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है कंपनी

हालांकि यूल टी को उपभोक्ताओं से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती रही है, लेकिन कंपनी पिछले कुछ वर्षों से परिचालन और वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी संस्थानों में बड़े पैमाने पर Yule Tea का उपयोग शुरू होता है, तो इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार आने की संभावना बढ़ जाएगी।

‘मन की बात’ में भी चाय का हुआ था जिक्र

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ में भारत की चाय संस्कृति का उल्लेख किया था।

उन्होंने स्वदेशी चाय उत्पादों, महिला स्वयं सहायता समूहों और देश के चाय उत्पादकों के योगदान की सराहना करते हुए कहा था कि भारतीय चाय केवल एक पेय नहीं, बल्कि देश की संस्कृति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है।

सरकार का यह नया कदम उसी सोच को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आत्मनिर्भर भारत अभियान को मिलेगा बल

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकारी खरीद में स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे न केवल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को लाभ मिलेगा बल्कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी मजबूती मिलेगी।

सरकारी संस्थानों में Yule Tea के इस्तेमाल से देश के चाय उद्योग, बागान श्रमिकों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सकारात्मक लाभ मिलने की उम्मीद है।

क्या बदल सकता है आने वाले समय में?

अब सभी की नजर इस बात पर है कि मंत्रालयों और सरकारी विभागों में इस फैसले को किस स्तर तक लागू किया जाता है। यदि अधिकांश सरकारी संस्थान Yule Tea को अपनाते हैं, तो यह सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मॉडल साबित हो सकता है।

सरकार का मानना है कि इस पहल से एक ओर सरकारी कंपनी को स्थायी बाजार मिलेगा, वहीं दूसरी ओर स्वदेशी उत्पादों के प्रति लोगों का विश्वास भी और मजबूत होगा।

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