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पासपोर्ट विवाद पर सियासी घमासान, विपक्ष ने पूछा- आखिर भारतीय होने का अंतिम प्रमाण क्या?

विदेश मंत्रालय के पासपोर्ट को अंतिम नागरिकता प्रमाण न मानने वाले बयान पर कांग्रेस, AIMIM और NCP (शरद पवार) ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

पासपोर्ट विवाद पर सियासी घमासान, विपक्ष ने पूछा- आखिर भारतीय होने का अंतिम प्रमाण क्या?

Focus Keyword: Passport Citizenship Controversy

Passport Citizenship Controversy को लेकर देश की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के उस बयान के बाद विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवालों की बौछार कर दी है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) है और इसे भारतीय नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। विपक्ष का कहना है कि इस बयान से आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पहचान और अनुमति प्रदान करना है। मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण न मानने की व्यवस्था कोई नई नहीं है, बल्कि यह लंबे समय से लागू कानूनी स्थिति है। सरकार का कहना है कि इस बयान से किसी नियम या कानून में कोई नया बदलाव नहीं किया गया है।

हालांकि, इस स्पष्टीकरण के बाद राजनीतिक विवाद और तेज हो गया। कांग्रेस, एआईएमआईएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) सहित कई विपक्षी दलों ने सरकार से सवाल किया कि यदि पासपोर्ट अंतिम नागरिकता प्रमाण नहीं है, तो फिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज निर्णायक माना जाएगा।

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इससे लोगों के बीच अनावश्यक भ्रम पैदा हो रहा है। उन्होंने पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6(2)(a) का हवाला देते हुए कहा कि कानून के अनुसार पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिक को ही जारी किया जाता है। ऐसे में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसके बयान का वास्तविक आशय क्या है।

वहीं, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता क्लाइड क्रास्टो ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पहले आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया, फिर मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) को भी अंतिम प्रमाण नहीं बताया गया और अब पासपोर्ट को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि आखिर भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए कौन-सा दस्तावेज अंतिम रूप से स्वीकार किया जाएगा।

क्रास्टो ने व्यंग्य करते हुए कहा कि कहीं भविष्य में ऐसा न हो कि किसी राजनीतिक दल की सदस्यता को ही नागरिकता का प्रमाण मान लिया जाए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि नागरिकता से जुड़े कानूनी प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। विदेश मंत्रालय का दावा है कि उसने केवल मौजूदा कानूनी स्थिति को दोहराया है और इसे नए नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय नागरिकता का निर्धारण अलग-अलग कानूनों और परिस्थितियों के आधार पर होता है। पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेज अलग-अलग प्रशासनिक और कानूनी उद्देश्यों के लिए जारी किए जाते हैं। किसी एक दस्तावेज की कानूनी स्थिति उसके उपयोग और संबंधित कानूनों पर निर्भर करती है।

इस मुद्दे ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छेड़ दी है। विपक्ष सरकार से नागरिकता संबंधी दस्तावेजों पर स्पष्ट और विस्तृत नीति सार्वजनिक करने की मांग कर रहा है, जबकि केंद्र का कहना है कि कानून में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

फिलहाल यह विवाद राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार की ओर से और स्पष्टीकरण आने की संभावना जताई जा रही है।

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