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धनबाद में भू-धंसान का कहर: 10 से अधिक घर जमींदोज, चार दो मंजिला मकान जमीन में समाए

झारखंड के धनबाद में जमीन धंसने से कई मकान क्षतिग्रस्त, स्थानीय लोगों ने खनन और ब्लास्टिंग को जिम्मेदार ठहराया; प्रशासन ने जांच और राहत कार्य शुरू किया।

Dhanbad Land Subsidence News: धनबाद में फिर दिखा भू-धंसान का खौफनाक चेहरा

झारखंड के कोयलांचल क्षेत्र धनबाद से शुक्रवार को भू-धंसान की बड़ी घटना सामने आई, जिसने पूरे इलाके में दहशत फैला दी। जमीन अचानक धंसने के कारण 10 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हो गए, जबकि चार दो मंजिला मकान पूरी तरह जमीन में समा गए। घटना के बाद प्रभावित परिवारों में अफरा-तफरी मच गई और लोग जान बचाकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे।

यह हादसा एक बार फिर धनबाद में खनन प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था और जमीन की स्थिरता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से संभावित खतरे की चेतावनी देते आ रहे थे, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।


कैसे हुआ हादसा?

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, सुबह के समय इलाके में अचानक तेज कंपन महसूस हुआ। कुछ ही देर में जमीन में दरारें पड़ने लगीं और कई मकान झुकने लगे। देखते ही देखते कुछ घरों की दीवारें टूट गईं और चार दो मंजिला मकान पूरी तरह धंस गए।

घटना के बाद आसपास के लोग तुरंत बाहर निकल आए। कई परिवारों ने जरूरी सामान तक छोड़ दिया और खुले स्थानों की ओर भागे। राहत की बात यह रही कि अधिकांश लोग समय रहते बाहर निकल गए, जिससे बड़ी जनहानि की सूचना नहीं मिली।


स्थानीय लोगों ने खनन और ब्लास्टिंग को बताया जिम्मेदार

इलाके के निवासियों का आरोप है कि क्षेत्र में लगातार हो रही भारी ब्लास्टिंग और खनन गतिविधियों के कारण जमीन अंदर से कमजोर हो चुकी थी। उनका कहना है कि पिछले कई महीनों से मकानों में कंपन, दीवारों में दरारें और जमीन में हल्की धंसान जैसी घटनाएं होती रही थीं।

स्थानीय लोगों के अनुसार:

  • बार-बार शिकायतें की गई थीं।
  • प्रशासन और संबंधित खनन अधिकारियों को खतरे की जानकारी दी गई थी।
  • सुरक्षा जांच और स्थायी समाधान की मांग की गई थी।

इसके बावजूद, लोगों का आरोप है कि किसी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।


पहले भी हो चुकी थी ऐसी घटना

बताया जा रहा है कि करीब एक माह पहले भी इसी क्षेत्र में भू-धंसान की घटना हुई थी। उस समय भी कई मकानों में दरारें आई थीं और लोगों ने इलाके को असुरक्षित बताया था।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि उस घटना के बाद व्यापक सर्वेक्षण और सुरक्षा उपाय किए गए होते, तो शायद इस बार इतना बड़ा नुकसान नहीं होता।


प्रभावित परिवारों की मांगें

भू-धंसान से प्रभावित परिवारों ने सरकार और प्रशासन से तत्काल मदद की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगें हैं:

  • 🏠 उचित मुआवजा
  • 🏘️ सुरक्षित पुनर्वास
  • 📋 पूरे इलाके का भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण
  • ⚖️ जिम्मेदार अधिकारियों और खनन एजेंसियों पर कार्रवाई
  • 🚫 असुरक्षित क्षेत्रों में खनन गतिविधियों की समीक्षा

कई परिवार फिलहाल अस्थायी आश्रयों में रहने को मजबूर हैं और भविष्य को लेकर चिंतित हैं।


खनन क्षेत्र के जीएम का बयान

संबंधित खनन क्षेत्र के महाप्रबंधक (जीएम) ने कहा कि प्रारंभिक जांच में अवैध खनन भू-धंसान की प्रमुख वजह के रूप में सामने आया है। उनके अनुसार, विस्तृत तकनीकी जांच के बाद ही वास्तविक कारणों का स्पष्ट पता चल सकेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि विशेषज्ञों की टीम को मौके पर भेजा गया है और प्रभावित क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति का अध्ययन कराया जाएगा।


प्रशासन ने शुरू किया राहत और बचाव कार्य

घटना की सूचना मिलते ही जिला प्रशासन, पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीमें मौके पर पहुंच गईं। प्रशासन ने:

  • प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया,
  • इलाके की घेराबंदी की,
  • अतिरिक्त भू-धंसान की आशंका वाले क्षेत्रों को खाली कराया,
  • और पूरे क्षेत्र की निगरानी बढ़ा दी।

अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे प्रशासन की अनुमति के बिना क्षतिग्रस्त मकानों में वापस न जाएं।


धनबाद में भू-धंसान क्यों बड़ी समस्या है?

धनबाद देश का प्रमुख कोयला खनन क्षेत्र है। यहां दशकों से भूमिगत और सतही खनन होता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, कई पुराने खनन क्षेत्रों में खाली सुरंगें, कमजोर भूस्तर और अनियंत्रित खनन गतिविधियां भू-धंसान के खतरे को बढ़ाती हैं।

विशेष रूप से:

  • पुराने भूमिगत खनन क्षेत्र,
  • अवैध खनन,
  • अनियंत्रित ब्लास्टिंग,
  • और पर्याप्त भू-वैज्ञानिक निगरानी की कमी

ऐसी घटनाओं की संभावना को बढ़ा सकती है।


विशेषज्ञों की राय

भू-विज्ञान और खनन विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे क्षेत्रों में नियमित जियो-टेक्निकल सर्वे, ड्रोन मैपिंग और भूमिगत संरचनाओं की निगरानी बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि केवल राहत कार्य पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि दीर्घकालिक पुनर्वास और जोखिम प्रबंधन नीति की आवश्यकता है।


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