भारत छोड़ो आंदोलन -2: जब Cripps Mission नहीं सुलझा सका गतिरोध, बना भारत छोड़ो आंदोलन का कारण
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में वर्ष 1942 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। इसी वर्ष ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन उसका प्रयास सफल नहीं हो सका। यह प्रयास Cripps Mission के रूप में सामने आया, जिसकी विफलता ने आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) की नींव रखी।

भारत छोड़ो आंदोलन -2: जब Cripps Mission नहीं सुलझा सका गतिरोध, बना भारत छोड़ो आंदोलन का कारण
भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में वर्ष 1942 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। इसी वर्ष ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश की, लेकिन उसका प्रयास सफल नहीं हो सका। यह प्रयास Cripps Mission के रूप में सामने आया, जिसकी विफलता ने आगे चलकर भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) की नींव रखी।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन को भारत के सहयोग की आवश्यकता थी। युद्ध तेजी से फैल रहा था और ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भारतीय राजनीतिक दल उसका समर्थन करें। लेकिन भारतीय नेताओं की मांग साफ थी—यदि भारत से सहयोग चाहिए, तो उसे स्वतंत्रता की दिशा में ठोस आश्वासन भी देना होगा।
इसी उद्देश्य से मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उनका मकसद भारतीय नेताओं और ब्रिटिश सरकार के बीच चल रहे राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करना था। क्रिप्स अपने साथ एक प्रस्ताव लेकर आए, जिसे इतिहास में क्रिप्स प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है।
इस प्रस्ताव के तहत ब्रिटेन ने युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने की बात कही। साथ ही एक नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा गठित करने का आश्वासन भी दिया गया। पहली नजर में यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण लग रहा था, लेकिन भारतीय नेताओं को इसमें कई बड़ी खामियां दिखाई दीं।
कांग्रेस का मानना था कि ब्रिटिश सरकार तत्काल सत्ता हस्तांतरण को लेकर गंभीर नहीं है। प्रस्ताव में यह स्पष्ट नहीं था कि भारतीयों को तुरंत शासन में कितनी भागीदारी मिलेगी। महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव को प्रसिद्ध रूप से “Post-Dated Cheque on a Crashing Bank” यानी डूबते बैंक का भविष्य की तारीख वाला चेक बताया था।
कांग्रेस नेताओं का तर्क था कि भारत को केवल भविष्य के वादों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। देश उस समय स्वतंत्रता की स्पष्ट गारंटी चाहता था। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम लीग भी प्रस्ताव से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी। लीग की पाकिस्तान संबंधी मांगों को लेकर भी स्पष्टता नहीं थी।
इस प्रकार क्रिप्स मिशन कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों का विश्वास जीतने में असफल रहा। कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी। अंततः अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन बिना किसी समझौते के वापस लौट गया।
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद देश में निराशा और असंतोष का माहौल बढ़ गया। भारतीय नेताओं को लगने लगा कि ब्रिटिश सरकार भारत को वास्तविक स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं है। जनता के बीच भी यह भावना मजबूत हुई कि अब केवल बातचीत से आजादी नहीं मिलने वाली।
महात्मा गांधी ने इसी समय ब्रिटिश शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष की आवश्यकता महसूस की। उनका मानना था कि अब अंग्रेजों को भारत छोड़ देना चाहिए और भारतीयों को अपना भविष्य स्वयं तय करने का अधिकार मिलना चाहिए।
इसके बाद अगस्त 1942 में मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक हुई। यहीं गांधी जी ने ऐतिहासिक “करो या मरो” का संदेश दिया और “अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नारा बुलंद किया।
8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सबसे व्यापक जनआंदोलनों में से एक बन गया। देशभर में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। छात्रों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं ने भी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कड़ा रुख अपनाया। गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल समेत लगभग सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन थमा नहीं। कई स्थानों पर भूमिगत संगठनों ने स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी।
इतिहासकारों का मानना है कि क्रिप्स मिशन की विफलता और भारत छोड़ो आंदोलन के बीच सीधा संबंध था। यदि ब्रिटिश सरकार उस समय भारतीय नेताओं की मांगों को गंभीरता से स्वीकार कर लेती, तो शायद परिस्थितियां अलग होतीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और परिणामस्वरूप स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जनआंदोलन शुरू हो गया।
भारत छोड़ो आंदोलन भले ही तत्काल स्वतंत्रता नहीं दिला सका, लेकिन इसने ब्रिटिश शासन को यह एहसास करा दिया कि अब भारत पर लंबे समय तक शासन करना संभव नहीं है। यही आंदोलन आगे चलकर 1947 की स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण आधार बना।
इस तरह Cripps Mission Failure केवल एक असफल राजनीतिक वार्ता नहीं थी, बल्कि वह घटना थी जिसने भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की और स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक दिशा दी।



