
पवनराजे निंबालकर मर्डर केस में बड़ा फैसला, 20 साल बाद सभी आरोपी बरी
पवनराजे निंबालकर मर्डर केस महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे चर्चित और संवेदनशील मामलों में से एक रहा है। करीब दो दशक तक सुर्खियों में रहने वाले इस मामले में आखिरकार सीबीआई की विशेष अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। अदालत ने एनसीपी के पूर्व नेता पद्मसिंह पाटिल सहित सभी आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यह फैसला 20 जून 2026 को सुनाया गया।
इस मामले की सुनवाई जुलाई 2011 से शुरू हुई थी और लगभग 15 वर्षों तक चली। जांच के दौरान सीबीआई ने सैकड़ों दस्तावेज पेश किए और बड़ी संख्या में गवाहों के बयान दर्ज किए। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हो सका।
कौन थे पवनराजे निंबालकर?
पवनराजे निंबालकर महाराष्ट्र के उस्मानाबाद (वर्तमान धाराशिव) क्षेत्र के प्रभावशाली और उभरते हुए राजनीतिक नेता थे। उनका परिवार लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय रहा था और स्थानीय स्तर पर उनका मजबूत जनाधार माना जाता था।
पवनराजे निंबालकर और पद्मसिंह पाटिल आपस में रिश्तेदार भी थे। एक समय दोनों परिवारों के बीच राजनीतिक और पारिवारिक संबंध काफी मजबूत थे, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच मतभेद बढ़ते गए। बाद में यह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता खुलकर सामने आई और पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई।
3 जून 2006 की रात क्या हुआ था?
3 जून 2006 की रात पवनराजे निंबालकर अपने ड्राइवर समद काजी के साथ कार से यात्रा कर रहे थे। इसी दौरान नवी मुंबई के पास उनकी गाड़ी पर घात लगाकर हमला किया गया। हमलावर कार और मोटरसाइकिल पर सवार थे।
हमला इतना घातक था कि पवनराजे निंबालकर और उनके ड्राइवर समद काजी की मौके पर ही मौत हो गई। शुरुआती जांच में इसे एक सुनियोजित कॉन्ट्रैक्ट किलिंग यानी सुपारी देकर कराई गई हत्या माना गया। इस घटना ने पूरे महाराष्ट्र में राजनीतिक हलचल पैदा कर दी थी।
सीबीआई को क्यों सौंपी गई जांच?
हत्या के बाद शुरुआती जांच महाराष्ट्र पुलिस ने की थी, लेकिन मामला राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील होने के कारण इसकी जांच बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।
सीबीआई ने अपनी जांच में दावा किया था कि यह हत्या एक सोची-समझी साजिश के तहत कराई गई थी। एजेंसी ने 2009 में करीब 5,000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी। जांच एजेंसी का आरोप था कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते पवनराजे निंबालकर की हत्या की साजिश रची गई और इसके लिए कथित तौर पर 30 लाख रुपये की सुपारी दी गई।
सीबीआई ने पद्मसिंह पाटिल समेत कुल 9 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें कथित शूटर, साजिशकर्ता और घटना को अंजाम देने वाले अन्य लोग शामिल थे। जांच के दौरान एजेंसी ने 181 गवाहों के बयान और 200 से अधिक दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत किए।
अन्ना हजारे भी बने थे गवाह
इस मामले की सबसे चर्चित बातों में से एक यह थी कि सामाजिक कार्यकर्ता Anna Hazare का बयान भी अदालत में दर्ज किया गया था। सीबीआई ने कुल 128 गवाहों के बयान अदालत में प्रस्तुत किए थे। सुनवाई के दौरान अन्ना हजारे ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें पद्मसिंह पाटिल की ओर से धमकी मिलने की बात कही गई थी।
हालांकि अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहियों का परीक्षण करने के बाद माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को पर्याप्त रूप से सिद्ध नहीं कर पाया।
आखिर क्यों महत्वपूर्ण था यह मामला?
पवनराजे निंबालकर हत्याकांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं था, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़ा एक बड़ा विवाद भी था। एक तरफ पवनराजे निंबालकर क्षेत्र के उभरते नेता थे, वहीं दूसरी ओर पद्मसिंह पाटिल राज्य की राजनीति के प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते थे।
पद्मसिंह पाटिल मंत्री और सांसद भी रह चुके हैं। वर्ष 2019 में उन्होंने एनसीपी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वर्तमान में उनके पुत्र राणा जगजीतसिंह पाटिल उस्मानाबाद क्षेत्र से विधायक हैं।
करीब 20 साल तक चर्चा में रहे इस मामले में आए फैसले को महाराष्ट्र की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अदालत के फैसले के बाद भी यह मामला राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बना रह सकता है।