क्या है परिसीमन विधेयक? जिसके लिए मोदी सरकार जुटा रही दो-तिहाई बहुमत

लोकसभा सीटों के पुनर्गठन को लेकर केंद्र सरकार की तैयारी तेज, दक्षिणी राज्यों ने जताई चिंता।

परिसीमन विधेयक को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार लोकसभा सीटों के पुनर्गठन और संभावित विस्तार से जुड़े इस महत्वपूर्ण विधेयक को संसद में पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने की कोशिश में जुटी हुई है। इस विधेयक के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसके चलते संसद में दो-तिहाई बहुमत हासिल करना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक सांसद और विधायक लगभग समान संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करें। भारत में आखिरी बार परिसीमन प्रक्रिया 2002 में गठित परिसीमन आयोग की सिफारिशों के आधार पर लागू हुई थी।

सरकार के प्रस्तावित मॉडल के अनुसार भविष्य में लोकसभा की सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर लगभग 850 तक की जा सकती है। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि देश की आबादी लगातार बढ़ी है, जबकि लोकसभा सीटों की संख्या कई दशकों से लगभग स्थिर बनी हुई है। अधिक सीटें होने से सांसदों पर प्रतिनिधित्व का बोझ कम होगा और जनता को बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सकेगा।

हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों तक जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है। यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रभाव कम हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन विधेयक केवल सीटों के पुनर्गठन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश के राजनीतिक संतुलन और संघीय ढांचे से भी जुड़ा विषय बन चुका है। इसी कारण इस पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हो रही है।

बताया जा रहा है कि अप्रैल 2026 में इसी विषय से जुड़े एक संविधान संशोधन प्रस्ताव को संसद में आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं मिल पाया था। अब बदलते राजनीतिक समीकरणों और विपक्षी दलों में संभावित टूट के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा और एनडीए इस बार आवश्यक बहुमत जुटाने में सफल हो पाएंगे।

यदि यह विधेयक पारित होता है तो इसका असर आने वाले वर्षों में देश की संसदीय राजनीति, राज्यों की प्रतिनिधित्व क्षमता और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी देखने को मिल सकता है।

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