
परिसीमन बिल और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयकों को लेकर केंद्र की मोदी सरकार आगामी मॉनसून सत्र में बड़ी राजनीतिक परीक्षा का सामना कर सकती है। इन विधेयकों को संसद से पारित कराने के लिए संविधान के अनुसार विशेष बहुमत यानी दोनों सदनों में आवश्यक दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। ऐसे में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए यह सत्र बेहद अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि सरकार इन अहम विधेयकों को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। हालांकि संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी प्रस्ताव को पारित कराने के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता, बल्कि संसद में निर्धारित विशेष बहुमत हासिल करना अनिवार्य होता है। यही कारण है कि लोकसभा और राज्यसभा में हर सांसद का समर्थन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मॉनसून सत्र से पहले देश की राजनीतिक परिस्थितियों में कई बदलाव देखने को मिले हैं। विभिन्न दलों के भीतर राजनीतिक हलचल, नेताओं के रुख में बदलाव और संभावित नए समीकरणों को लेकर चर्चाएं जारी हैं। इन घटनाक्रमों का असर संसद में सरकार और विपक्ष की रणनीति पर भी पड़ सकता है। हालांकि अंतिम स्थिति संसद में विधेयक पेश होने और मतदान के दौरान ही स्पष्ट होगी।
परिसीमन विधेयक को लेकर कई राज्यों की अलग-अलग चिंताएं भी सामने आती रही हैं। दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल पहले भी आशंका जता चुके हैं कि नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होने से राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के संतुलन पर असर पड़ सकता है। वहीं कुछ अन्य दलों का मानना है कि बढ़ती आबादी के अनुसार संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
इसी तरह ‘एक देश, एक चुनाव’ का मुद्दा भी लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। केंद्र सरकार का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से चुनावी खर्च कम होगा, प्रशासनिक संसाधनों की बचत होगी और विकास कार्यों में बार-बार चुनावी आचार संहिता की बाधा नहीं आएगी। दूसरी ओर कई विपक्षी दलों का कहना है कि इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा और सभी राज्यों की सहमति जरूरी है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार को कुछ क्षेत्रीय दलों का समर्थन मिलता है, तो उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है। वहीं विपक्ष भी सरकार को चुनौती देने के लिए साझा रणनीति तैयार करने में जुटा हुआ है। संसद के भीतर होने वाली बहस और सहयोगी दलों का रुख इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
संविधान संशोधन से जुड़े विधेयकों को लेकर अक्सर राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश की जाती है, क्योंकि ऐसे कानूनों का प्रभाव लंबे समय तक देश की शासन व्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए सरकार भी विपक्ष और सहयोगी दलों के साथ संवाद बनाकर आगे बढ़ने की रणनीति अपना सकती है।
मॉनसून सत्र में संसद का माहौल काफी गर्म रहने की संभावना है। विपक्ष जहां सरकार से कई मुद्दों पर जवाब मांग सकता है, वहीं सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। परिसीमन विधेयक और ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसे प्रस्तावों पर होने वाली चर्चा पूरे देश की नजरों में रहेगी।
यदि सरकार आवश्यक विशेष बहुमत जुटाने में सफल रहती है, तो यह उसके लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी। वहीं यदि विपक्ष आवश्यक संख्या जुटाकर इन विधेयकों का विरोध करता है, तो सरकार को आगे की रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। ऐसे में आगामी मॉनसून सत्र केवल विधायी प्रक्रिया ही नहीं बल्कि राजनीतिक शक्ति परीक्षण के रूप में भी देखा जा रहा है।
फिलहाल सभी की नजर संसद के मॉनसून सत्र पर टिकी हुई है। सरकार, विपक्ष और सहयोगी दलों की रणनीति आने वाले दिनों में साफ होगी। परिसीमन विधेयक और अन्य संविधान संशोधन प्रस्तावों पर होने वाली बहस देश की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।