झारखंड राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग बनेगी गेम चेंजर? नाथवाणी की राह में वरीयता मतों की बड़ी भूमिका

दो सीटों के लिए होने वाले राज्यसभा चुनाव में संख्या बल के साथ प्रथम और द्वितीय वरीयता के वोटों पर टिकी सबकी नजरें, क्रॉस वोटिंग बदल सकती है पूरा गणित।

झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव में संख्या बल के साथ-साथ क्रॉस वोटिंग और वरीयता मतों की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी नतीजों की दिशा इन्हीं कारकों से तय हो सकती है।

झारखंड गठन के बाद अब तक राज्यसभा के लिए 19 चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 12 द्विवार्षिक और 7 उपचुनाव शामिल हैं। राज्यसभा चुनावों में प्रथम और द्वितीय वरीयता के वोटों का महत्व हमेशा से निर्णायक रहा है। कई मौकों पर उम्मीदवारों की जीत और हार का फैसला इन्हीं वरीयता मतों के आधार पर हुआ है।

इस बार भी चुनावी मुकाबले में संख्या बल के साथ क्रॉस वोटिंग की संभावनाओं पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कुछ विधायक पार्टी लाइन से हटकर मतदान करते हैं, तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। खासकर निर्दलीय या अतिरिक्त उम्मीदवारों के लिए क्रॉस वोटिंग काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

उद्योगपति एवं राज्यसभा प्रत्याशी Parimal Nathwani की संभावनाओं को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है। विशेषज्ञों का मानना है कि उनकी जीत की राह काफी हद तक क्रॉस वोटिंग और द्वितीय वरीयता के मतों पर निर्भर कर सकती है। यदि कुछ विधायकों का समर्थन अपेक्षा से अलग दिशा में जाता है, तो चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

इसी कारण सभी प्रमुख दल अपने विधायकों को एकजुट रखने और किसी भी तरह की टूट-फूट से बचाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। चुनाव के अंतिम नतीजे न केवल संख्या बल बल्कि विधायकों की राजनीतिक रणनीति और वरीयता मतों के उपयोग पर भी निर्भर करेंगे।

कुल मिलाकर झारखंड राज्यसभा चुनाव में सिर्फ अंकगणित ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रबंधन, क्रॉस वोटिंग और वरीयता मत भी निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं। अब सभी की नजरें मतदान और उसके बाद आने वाले परिणामों पर टिकी हैं।

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