
झारखंड में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी की जनगणना को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। ओबीसी समुदाय की सही आबादी का आंकड़ा सामने लाने और जनगणना प्रक्रिया में उनकी स्पष्ट पहचान सुनिश्चित करने की मांग को लेकर 16 सितंबर को रांची में पैदल मार्च निकाला जाएगा। इस मार्च का आयोजन ओबीसी के लिए जनगणना फॉर्म में अलग कॉलम और स्पष्ट कोड की व्यवस्था की मांग को लेकर किया जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, पैदल मार्च बापू वाटिका से शुरू होगा और लोकभवन होते हुए राजभवन तक जाएगा। मार्च के बाद राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा जाएगा। ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार से मांग की जाएगी कि जनगणना के फॉर्म में ओबीसी के लिए अलग कॉलम बनाया जाए और उनकी जातीय पहचान दर्ज करने के लिए स्पष्ट डिजिटल कोड की व्यवस्था की जाए।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मौजूदा जनगणना प्रक्रिया में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अलग पहचान की व्यवस्था है, लेकिन ओबीसी के लिए इसी तरह का स्पष्ट कॉलम नहीं रखा गया है। पार्टी का मानना है कि इससे ओबीसी समुदाय की वास्तविक आबादी का सही आंकड़ा सामने आने में परेशानी हो सकती है।
अलग-अलग नामों से दर्ज होने पर आंकड़ों में हो सकती है गड़बड़ी
कांग्रेस नेताओं ने चिंता जताई है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में एक ही जाति या समुदाय को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। यदि जनगणना के दौरान इन नामों को अलग-अलग दर्ज किया गया, तो एक ही समुदाय की आबादी कई हिस्सों में बंट सकती है। इससे वास्तविक संख्या का आकलन करना मुश्किल हो सकता है।
इसी समस्या को दूर करने के लिए ओबीसी के लिए एक समान और वैज्ञानिक कोडिंग व्यवस्था की मांग की जा रही है। कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने जनगणना में ओबीसी के लिए अलग डिजिटल कोड की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनका कहना है कि डिजिटल कोड के माध्यम से जातियों और समुदायों की पहचान को व्यवस्थित तरीके से दर्ज किया जा सकेगा।
प्रदीप यादव के अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों में जातियों के नाम और स्थानीय पहचान बदल सकती है। ऐसे में एक समान कोड होने से आंकड़ों को जोड़ने, उनका विश्लेषण करने और वास्तविक आबादी का आकलन करने में सुविधा होगी। इससे जनगणना के आंकड़े अधिक स्पष्ट और विश्वसनीय बन सकते हैं।
सही आबादी के आंकड़े को बताया जरूरी
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा है कि ओबीसी की सही आबादी का आंकड़ा सामने आना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किसी समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का आकलन किया जा सकता है।
ओबीसी समुदाय की आबादी से जुड़े स्पष्ट आंकड़े सरकारी योजनाओं, आरक्षण, सामाजिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व से संबंधित नीतियां बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि किसी समुदाय की वास्तविक संख्या ही स्पष्ट नहीं होगी, तो उसके लिए योजनाओं और अधिकारों का सही निर्धारण करना भी कठिन हो जाएगा।
पार्टी नेताओं का आरोप है कि झारखंड में ओबीसी की आबादी काफी बड़ी है, लेकिन कई क्षेत्रों में उन्हें उनकी जनसंख्या के अनुपात में अधिकार और प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। इसी वजह से जनगणना में ओबीसी की अलग पहचान और सही आंकड़े की मांग को महत्वपूर्ण मुद्दा बताया जा रहा है।
16 सितंबर का मार्च क्यों है महत्वपूर्ण?
16 सितंबर को प्रस्तावित पैदल मार्च को कांग्रेस ओबीसी अधिकारों से जुड़े बड़े अभियान के रूप में देख रही है। मार्च में राज्य के अलग-अलग इलाकों से ओबीसी समुदाय के लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं के शामिल होने की बात कही गई है। मार्च के जरिए केंद्र सरकार तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की जाएगी कि ओबीसी की जनगणना में उनकी स्पष्ट पहचान और सही संख्या दर्ज की जानी चाहिए।
मार्च बापू वाटिका से शुरू होकर लोकभवन और राजभवन तक जाएगा। राजभवन में राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर केंद्र सरकार से जनगणना फॉर्म में अलग कॉलम और डिजिटल कोड की व्यवस्था करने की मांग की जाएगी।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह केवल जातीय आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा भी है। पार्टी का मानना है कि सही आंकड़ों के आधार पर ही सरकार यह तय कर सकती है कि किस समुदाय को कितनी योजनाओं, संसाधनों और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।
सरकार के रुख पर भी नजर
अब सभी की नजर 16 सितंबर के मार्च पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मार्च में कितनी संख्या में लोग शामिल होते हैं और राज्यपाल को सौंपे जाने वाले ज्ञापन पर सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है। साथ ही, यह भी देखना होगा कि केंद्र सरकार ओबीसी के लिए अलग कॉलम और डिजिटल कोड की मांग पर क्या कदम उठाती है।
ओबीसी जनगणना को लेकर देश के कई हिस्सों में पहले भी राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। झारखंड में यह मुद्दा अब सड़क से लेकर राजनीतिक मंच तक पहुंच गया है। कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जोड़कर देख रही है, जबकि आगे की प्रक्रिया केंद्र सरकार के निर्णय पर निर्भर करेगी।
फिलहाल 16 सितंबर का पैदल मार्च झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। मार्च के बाद ओबीसी जनगणना की मांग को लेकर आंदोलन और तेज होता है या सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन मिलता है, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।