
Aamir Khan Film: बॉलीवुड की कई ऐसी फिल्में रही हैं जिन्हें रिलीज से पहले ज्यादा उम्मीदों के साथ नहीं देखा गया, लेकिन सिनेमाघरों में पहुंचते ही उन्होंने इतिहास रच दिया। ऐसी ही फिल्मों में शामिल है वर्ष 1988 में रिलीज हुई आमिर खान और जूही चावला की फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’। यह फिल्म न सिर्फ आमिर खान के करियर की बड़ी सफलता साबित हुई, बल्कि हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार रोमांटिक फिल्मों में भी शामिल हो गई। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि रिलीज से पहले इस फिल्म को लेकर इंडस्ट्री में काफी निराशा थी और कई डिस्ट्रीब्यूटर्स ने इसे खरीदने से भी इनकार कर दिया था।
Aamir Khan Film ‘कयामत से कयामत तक’ को लेकर यह खुलासा फिल्म के संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने एक रियलिटी शो के दौरान किया। उन्होंने बताया कि फिल्म के ट्रायल शो के बाद कई डिस्ट्रीब्यूटर्स का मानना था कि इसकी कहानी और संगीत दर्शकों को प्रभावित नहीं कर पाएंगे। कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया था कि फिल्म का संगीत बहुत धीमा है और यह बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं होगी।
आनंद-मिलिंद के अनुसार, डिस्ट्रीब्यूटर्स के पीछे हटने के बाद निर्माता नासिर हुसैन को फिल्म खुद रिलीज करने का फैसला लेना पड़ा। यह निर्णय जोखिम भरा जरूर था, लेकिन उन्हें अपनी फिल्म और उसकी कहानी पर पूरा भरोसा था। यही भरोसा बाद में सही साबित हुआ और फिल्म ने रिलीज के बाद शानदार सफलता हासिल की।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका संगीत बना। ‘पापा कहते हैं’, ‘ऐ मेरे हमसफर’, ‘गजब का है दिन’ और ‘अकेले हैं तो क्या गम है’ जैसे गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गए। इन गानों ने युवाओं के बीच ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि कई कॉलेज छात्र सिर्फ इन गीतों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए थिएटर पहुंचते थे। आनंद-मिलिंद ने बताया कि कई दर्शक गाने खत्म होने के बाद सिनेमाघर से बाहर निकल जाते थे, जो उस दौर में फिल्म के संगीत की लोकप्रियता का बड़ा उदाहरण था।
फिल्म में आमिर खान और जूही चावला की जोड़ी को भी दर्शकों ने खूब पसंद किया। दोनों कलाकारों की मासूम प्रेम कहानी और भावनात्मक अभिनय ने फिल्म को एक अलग पहचान दी। रिलीज के बाद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और आमिर खान के करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई।
आनंद-मिलिंद ने इस सफलता का श्रेय पूरी टीम को देते हुए कहा कि निर्देशक मंसूर खान की संगीत को लेकर गहरी समझ और फिल्म की प्रस्तुति ने इसे खास बना दिया। उनका मानना है कि जब कहानी, संगीत और अभिनय एक साथ प्रभाव छोड़ते हैं, तभी कोई फिल्म लंबे समय तक दर्शकों के दिलों में जगह बना पाती है।
आज भी ‘कयामत से कयामत तक’ के गीत रेडियो, म्यूजिक प्लेटफॉर्म और स्टेज शो में उतने ही पसंद किए जाते हैं, जितने रिलीज के समय थे। फिल्म ने यह साबित किया कि किसी भी फिल्म का भविष्य केवल शुरुआती प्रतिक्रियाओं से तय नहीं होता। यदि कहानी और संगीत दर्शकों के दिलों को छू लें, तो वही फिल्म समय के साथ क्लासिक बन जाती है।
‘कयामत से कयामत तक’ की सफलता हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी मिसाल है, जिसने यह सिखाया कि कभी-कभी सबसे बड़े फैसले दर्शक करते हैं, न कि शुरुआती समीक्षक या डिस्ट्रीब्यूटर्स। रिलीज से पहले जिस फिल्म को फ्लॉप माना जा रहा था, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार रोमांटिक फिल्मों में शामिल हो गई।