
ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा की, अमेरिकी हमलों के बाद तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर बढ़ी चिंता
दुनिया की नजर एक बार फिर पश्चिम एशिया पर टिक गई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। ईरान ने हालिया अमेरिकी हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इन्हें गैरकानूनी और आक्रामक कार्रवाई बताया है। ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी कार्रवाई को ‘युद्ध अपराध’ तक करार दिया है। यह विवाद ऐसे समय में बढ़ा है जब फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में समुद्री गतिविधियां पहले से ही तनावपूर्ण बनी हुई हैं।
हालिया घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरानी तेल टैंकरों को निशाना बनाया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, 5 सितंबर को ईरान की ओर से अमेरिकी नौसैनिक जहाजों पर बैलिस्टिक मिसाइल हमलों के बाद तीन ईरानी क्रूड ऑयल टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई की गई। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इन जहाजों का संबंध ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड से जुड़े कथित शैडो नेटवर्क से था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इस कार्रवाई में दो टैंकरों को निष्क्रिय किया गया, जबकि एक अन्य टैंकर को नष्ट किया गया।
ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई पर जताया कड़ा विरोध
अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में अपने तेल टैंकरों के खिलाफ अमेरिकी हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया। ईरानी अधिकारियों ने इसे गैरकानूनी और आक्रामक कार्रवाई बताते हुए युद्ध अपराध तक कहा है।
तेहरान का कहना है कि वाणिज्यिक जहाजों और समुद्री परिवहन को निशाना बनाने से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। ईरान लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि फारस की खाड़ी और खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी सैन्य दबाव का जवाब दिया जा सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच क्यों बढ़ रहा तनाव?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव नया नहीं है, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने इसे एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंचा दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई और जवाबी कार्रवाई का सिलसिला चल रहा है। अमेरिकी पक्ष ईरानी सैन्य गतिविधियों और अमेरिकी जहाजों पर हमलों को अपनी कार्रवाई का आधार बता रहा है, जबकि ईरान अमेरिकी हमलों को आक्रामकता और संप्रभुता का उल्लंघन बता रहा है।
ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी नौसैनिक जहाजों को निशाना बनाए जाने के बाद अमेरिका ने ईरानी तेल टैंकरों पर हमला किया। इसके बाद ईरान ने भी अमेरिकी और पश्चिमी हितों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे यह आशंका बढ़ रही है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव और तेज हो सकता है।
खाड़ी क्षेत्र पर पूरी दुनिया की नजर
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा कारण सिर्फ सैन्य तनाव नहीं है। फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग हैं। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों का परिवहन होता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
हाल की रिपोर्टों के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से समुद्री यातायात में बड़ी गिरावट आई है और जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। इससे शिपिंग और बीमा लागत पर भी दबाव बढ़ सकता है।
तेल की कीमतों पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ने का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। अगर खाड़ी क्षेत्र से तेल की सप्लाई बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है।
रिपोर्टों के मुताबिक हालिया तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी है। बाजार को आशंका है कि अगर संघर्ष और बढ़ा या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित हुई, तो तेल की कीमतों पर और दबाव बन सकता है।
इसका असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। भारत समेत दुनिया के कई देश कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं। तेल महंगा होने पर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, उत्पादन और कई दूसरी वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई पर भी दबाव बनने की आशंका रहती है।
भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम
भारत के लिए पश्चिम एशिया की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। भारत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र भारत के ऊर्जा आयात के लिए अहम है। इसके अलावा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं।
अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है तथा समुद्री मार्गों पर अस्थिरता आती है, तो इसका असर भारत के तेल आयात, शिपिंग लागत और व्यापार पर पड़ सकता है। हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तनाव कितने समय तक चलता है और समुद्री परिवहन कितना प्रभावित होता है।
OPEC+ भी स्थिति पर रख रहा नजर
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर तेल उत्पादक देशों के समूह OPEC+ पर भी पड़ रहा है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक OPEC+ अक्टूबर के लिए अपनी मौजूदा तेल उत्पादन नीति को बनाए रखने की दिशा में बढ़ रहा है। ईरान संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से प्रभावित तेल निर्यात ने वैश्विक तेल बाजार की स्थिति को और जटिल बना दिया है।
यानी आने वाले दिनों में तेल बाजार, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस संघर्ष का असर महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या बातचीत से खत्म होगा तनाव?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव आगे किस दिशा में जाएगा। अगर दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई बढ़ती है तो पश्चिम एशिया में संघर्ष का दायरा बढ़ने की आशंका है। वहीं अगर कूटनीतिक बातचीत का रास्ता खुलता है तो तनाव को कम किया जा सकता है।
फिलहाल स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। एक तरफ अमेरिका अपने सैन्य और आर्थिक दबाव को जारी रख रहा है, वहीं ईरान भी अमेरिकी कार्रवाई का जवाब देने की बात कह रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी नए घटनाक्रम का असर सिर्फ इन दो देशों पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
इसलिए आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान तनाव के साथ-साथ तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और वैश्विक बाजार की गतिविधियों पर भी दुनिया की नजर बनी रहेगी।